Monday, 13 April 2020

आभावों मे जुझता परिवार


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अभावों से जुझता परिवार

दुख से भरा घरबार

न अन्न गृहित माॅं

उस पर षिषु का त्योहार ।

फूल पर कंटिला बिस्तर

खाली पेट का संसार

पडोसी कभी अपनी दूध पिलाती

गृहित पड़ोसी का प्यार ।।

आरोप प्रत्यारोप का दौर

और लड़ाई कलह का द्वार

कुपित जननी गुस्से से

उठाया जब तलवार ।।। 1 ।।।

 

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अभावो से ......

थोड़े चने चबैने के कारण

चर्मकार से टकरार ।

भीक्षुक थें या थे ही

ऐसी बातों की सरोकार ।।

हीन नजरिया नीच सोच

किए सब मानवता का व्यापार ।।।

यह चोर दुनिया ने हमेषा

पहनाया बदनामी का हार

हम ना गम भरी जीवन

सम ना सम सी सार   ।।।।

 

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अभावों....................

किसी कि बची भोजन

और पहनावा बना उतार ।

प्रार्थी और याचक बने

गरीबी का गुहार ।।2।।

याचित वस्त्र याचित जूते

फिर चिढाती दुनियादार ।।।3।।।।

लोगो ने लतीफे कसी गुदड़ी के लाल

वह सच ही साकार *

क्यों डूबा मस्ती में

क्यों बन गया बेकार।।।।।

 

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अभावों....................

मौके मिले मेहनत कर

किस्मत नहीं खटखटाती सबकी द्वार

असफलता ही असफलता लाये

एक दो नहीं हजार

जब नाम ना जिंदा कर सके

तो मर ही जाना यार

व्यर्थ सोना बेकार लालच

कमर कस हो तैयार

क्या सोना क्या भोगना

मेहनत करना हद पार

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 अभावों..........

याद कर सौगंध को

अभाव ग्रस्तो को भी दे घरबार

जीवन की जंग में हाथ में तलवार

जिस पर मेहनत मेहनत मेहनत की धार

स्वयं ही राह का निर्माता

स्वयं ही किस्मत की विधाता

मेहनत की ही जीता संसार

अभावों..................

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3 comments:

  1. जिन्दगी की मुश्किल कर देती है हमे मजबूत,
    जो कर ना सकता कोई उसे करने को करती है मजबुर,
    जिन्दगी का यह फैसला हमे कभी रास ना आता है,
    लगता है बुरा पर करने के अलावा कोई चारा ना रह जाता है,
    तब प्रकृति दिखाती है अपना चमत्कार,
    अभावों के जीवन में होती है खुशी की बरसात,
    तब खुदा का वह फैसला हमे समझ आ जाता है,
    जिसे करने के अलावा कोई चारा ना रह जाता है

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    1. धन्यवाद मित्र! अपकी पंक्तियां प्रेरणादायक है। मुझे यकीन है आपकी व्यक्तित्व भी उम्दा होगा।

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