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मैंने मुस्कान नहीं देखे...
दुःख से पता नहीं कैसा रिस्ता था ।1।
कोई अरमान नहीं देखे....
मैंने मुस्कान नहीं देखे...
काम तो जैसे खत्म नहीं होते थें।2।
सेवा तो जैसे किस्मत था
आराम तो कभी था ही नहीें,
कुछ कर्मों को ही समझा जन्नत था। 3।
दुःखी देखा ऑसू देखा,
पर फरमान नहीं देखे...
मैंने मुस्कान नहीं देखे...
मेरे बाल्यवस्त्र धोये ऑचल में सुलाया।4।
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अपनी दूध भी पिलाई,
बिना रिस्ते, फिर भी किया सेवा,
बीमार से मरते में जिलाई। 1।
इतना किया फिर भी,
गुस्सा और अभिमान नहीं देखे...
मैंने मुस्कान नहीं देखे...
चलना सिखया, खाना सिखाया,
मेरे गुस्से पर वे मनाते। 2।
मेरी शरारतों को देखा तथा सराहा।
जब मैंने उन्हें दात काटे।
अति परेषान करने पर भी,
डॉट की जुबान नहीं देखे...
मैंने मुस्कान नहीं देखे...
कवि द्वारा मां व पुत्र का वात्सलय स्नेह का प्रेम पुर्वक वर्णन किया गया हैआपके प्यारे कवि--------------------अमित जी***********************
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