मित्रो
यह कविता विश्व की अमुर्त धरोहर भागवत गिता से लिया गया है यह काव्यांश
हमे कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देती है,मुझे मालुम है जब आप इसे पढेंगे तो
जरूर इससे प्रेरित हेांगे तब आपकी सोच कुछ करने के लिए उतावली होंगी जिसे
कुछ न कुछ जरूर आपकी जिवन मे परिवर्तन आयेगा। और आपका छोटा सा परिवर्तन इस
राष्ट्र को गरिमामय बना सकता है।मै पाठकगण से अनुरोध करूंगा की आप अपने
बच्चों को पढ कर सुनाये जिससे उनमे भारतीय संसकृति का विकास होगा।
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हर क्षण उनके बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
अतृप्त इच्छायें जो धन से लाचार हैं,
दुःख रोगी जो निर्धनता के शिकार है।
खुद को संकोचते, मन को जो मारते,
उन्हे भी तो हर सुख-शांति पाने का अधिकार है।
तुमने जिनके उद्धरण की कसमें खाये है।
हर क्षण उनके बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
बीमारियों से अछूतापन मे भय से,
लोगों की गालियों और जुड़ी मैं से,
उच्च-नीच जाति-पाति जो सहते,
जीते जो उपेक्षित, छोटेपन की संचय से।
जिनसे उत्पन्न जिन्के तुम साये हो।
हर क्षण उनके बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
काले अपोशित तन, मुह पर मिट्टी डाले है।
एकाद बार भोजन, अन्यथा उन्हें प्रकृति ने पाले है।
जिनके शौक तो कभी बने ही नहीं, उनके जरूरते,
आधे कपड़े पहने हो तो खाने के भी लाले है।
कुछ तो दूर करों जिनकी दुःख अधिकाय है।
हर क्षण उनके बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
रामूकाका, बुढ़िया, लाचारी, की ताने कस गए।
जब चाहे तब उन पर हस गए
खुद नहीं मरते, आत्म सम्मान रोज मरते हैं।
इतने पर भी इच्छाओं से जिंदगी तरस गए।
जिनकी कुछ तो कुछ उम्मीद बसाए हो।
हर क्षण उनके बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
भूख और यातनायें जिन्हें रोश भरती है।
मालिक की मार गालियॉं जोश भरती है।
चाहे आराम नहीं, मशीन से सस्ते,
जिन्हें सिर्फ चंद पल की नींदे ही मदहोश करती है।
जिनके लिए ऑखों में तुमने अच्छी जिंदगी सजाये हों।
हर क्षण उन्के बारे में सोचो
जिनके लिए तुम आये हो...
एक बार का खाना ही सुख लगती है।
यातनाये और गालियां भले ही दुःख लगती है।
घिसटते-घिसटते सड़क पर तम्मनायें भले न पूरी हो।
अपाहिज है बचपन से पर भूख तो लगती है।