Thursday, 14 May 2020

शायद मैं, लक्ष्य से कहीं भटक गया हूॅं ।

अक्सर लोग कहते हैंं हमसे ये नहींं होगा या इस कार्य को हम नहीं  कर पायेंंगे ऐसा ऐसा अपने आपको सबके सामने कमजोर साबित करने के बराबर है और ऐसा जो लोग कहते हैंं वे लोग अपनी जीवन के कोई जोखिम लेना ही नहींं चाहते हैंं क्‍योंकि जीवन में बिना जोखिम लिए आप कभी भी आगे बढ ही नही सकते हैंं।



शायद मैं, 
लक्ष्य से कहीं भटक गया हूॅं ।
वो प्राकृतिक पुत्र कहॉं है,
जो प्रकृति मुस्कान भरने आया था।
वो प्राकृतिक पु़त्र कहॉं है,
जो हर जड़ चेतन में नया प्राण भरने आया था।
अपनी मरती आत्मा को झकझोर कर पूछों,
कि वह प्राकृतिक पुत्र कहॉं है,
जो उसके लिए मरने सुबह शाम आया था।
वह ही उत्परिवर्तन तथा निर्माण का साया था।
पर शायद मैं, 
लक्ष्य से कहीं भटक गया हूॅं ।
वो प्राकृतिक पुत्र कहॉं है,

जो प्रकृति मुस्कान भरने आया था।



प्राकृतिक के अमूल्य धरोहर,
मेहनत लक्ष्य समर्पण बौद्धिकता ।
सुकोमल हृदय मर्मज्ञता,
एकाग्रता, लगन और सफलता।
सोचो और स्वार्थपर्यता से उपर उठो।
जो सत् संस्कारों से पोषित 
जिह्न और दिल में सोचो से देवता।
मैं ही सांसारिक लगाव में उन्हें भुलाया हूॅं
शायद मैं, 
लक्ष्य से कहीं भटक गया हूॅं ।
वो प्राकृतिक पुत्र कहॉं है,

जो प्रकृति मुस्कान भरने आया था।

3 comments:

  1. विपरीत परिस्थितियों में सारथी सा सांथी,👌👌

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