Monday, 25 May 2020

मुझे पत्थर सा बना दो।

मुझे पत्थर सा बना दो।
क्यों मन यादों को सजाये है,
मन में झूठी उम्मीदों को बसाये है।
अच्छाइयों पर गर्व क्यों नहीं करता,
क्यों बुराई मन में लालसाये है।
कड़वा ही सही पर सत्य जहर सा बना दों।
मुझे पत्थर सा बना दो।
क्यों परेशान करता है बार-बार,
क्यों गुलाब बनाता हर बार,
दृढ़ता प्रदान क्यों नहीं करता,
हो जाता है क्यों सवार।
यादों की बुरी स्मृतियॉं मिटा दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।
क्यों मन हर बार तड़पता है,
संंशय की दीवारें तकता है।
क्यों उत्कृष्ट कृतियॉं याद नहीं करता,
क्यों झूठी मस्ती के लिए मरता है।
हर सुख मस्तियॉं भूला दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।
कहॉं से आती है दूसरी सोच ,
क्यों मन करता रहता है संकोच।
क्यों प्रतिज्ञाओं पर नहीं जीता,
क्यों बेवजह ढोता है बोझ।
सोचों का हर कहर सा हटा दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।
हमारे मन को सत्कर्म की ओर मोडो,
हर मोह माया हर बंधन तोड़ो।
निबंध मुक्त सा अजाद हमेशा,
बुरे बुनियाद को पीछे छोड़ो।
मेरा मन बुद्धी बेअसर सा बना दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।
मेरे मन को खाली वा स्वतंत्र करों,
जीवन में अच्छाइयों का यंत्र करों।
सारी मुशिबतों से लड़ते हुए
सत्कर्म का जीवन में मंत्र भरो।
कर्मों का समुन्दर सा बना दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।
हर अच्छाइयों का मुझे साक्ष्य,
प्रतीक जैसे धर्मों का सत्य।
एक योगी एक तपस्वी,
भूख प्यास भूलकर सिर्फ लक्ष्य।
मुझे सफलताओं का भंवर सा बना दो।
मुझे पत्थर सा बना दो।

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