Monday, 15 June 2020

कैसे मैं उनके अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।

 

माता-पिता परम आदरणीय

एक पिता अपने छोटे से पुत्र को गोद में लिये बैठा था। एक कौआ सामने छज्जे पर बैठ गया। पुत्र ने पूछाः "पापा ! यह क्या है  पिताः"कौआ है।"


पुत्र ने फिर पूछाः "यह क्या है  पिता ने कहाः "कौआ है।"

पुत्र बार-बार पूछताः "पापा ! यह क्या है ?"

 पिता स्नेह से बार-बार कहताः "बेटा ! कौआ है कौआ।"

 कई वर्षों के बाद पिता बूढ़ा हो गया। एक दिन पिता चटाई पर बैठा था। घर में कोई उसके पुत्र से मिलने आया। पिता ने पूछाः "कौन आया है 

 पुत्र ने नाम बता दिया। थोड़ी देर में कोई और आया तो पिता ने फिर पूछा। पुत्र ने झल्ला कर कहाः "आप चुपचाप पड़े क्यों नहीं रहते !आपको कुछ करना-धरना तो है नहीं, ʹकौन आया, कौन गयाʹ दिन भर यह टाँय-टाँय क्यों लगाये रहते हैं

पिता ने लम्बी साँस खींची, हाथ से सिर पकड़ा। बड़े दुःख भरे स्वर में धीरे-धीरे कहने लगाः "मेरे एक बार पूछने पर तुम जितना क्रोध करते हो और तुम दसों बार एक ही बात पूछते थे कि यह क्या है  मैंने कभी तुम्हें झिड़का नहीं। मैं बार-बार तुम्हें बताताः बेटा ! कौआ है।" 

भूलकर भी कभी अपने माता-पिता का ऐसे तिरस्कार नहीं करना चाहिए। वे तुम्हारे लिए आदरणीय हैं। उनका मान-सम्मान करना तुम्हारा कर्तव्य है। माता पिता ने तुम्हारे पालन-पोषण में कितने कष्ट सहे हैं ! कितनी रातें माँ ने तुम्हारे लिए गीले में सोकर गुजारी हैं, और भी तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक कितने कष्ट तुम्हारे लिए सहन किये हैं, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। कितने-कितने कष्ट सहकर तुमको बड़ा किया और अब तुमको वृद्ध माता-पिता को प्यार से दो शब्द कहने में कठिनाई लगती है ! पिता को ʹपिताʹ कहने में भी शर्म आती है !

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चाहे लाख करो तुम पुजा तीर्थ करो हजार 
मगर मां बाप को ठुुकराया तो सब कुछ है बेकार
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कैसे मैं उनके अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं। 

कैसे मैं उन्हे, असहाय छोड़ दूॅं।
स्थितियों से लड़ते, नौ महीने पोषित किये,
हर कष्ट झेलते रहे, बना अतिप्रिय।
हर परिस्थितियों में रखा ख्याल,
असाह्य दर्द भी सहे, मेरे लिए।
कैसे मैं उनकी, असाह्य दर्दों को छोड़ दूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
अपने अरमानों को मार कर, खिलौने लायें,
खुद झेलकर दूर रखे, हम से दुख के सायें।
मुझ निर्बोध को लीए, 24सों घण्टे गोद में,
रक्त सिंचित दुध जिसने पिलायें।
खुद को कैसे, असफलता की ओर मोड दूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
जिन्होंने दुआये किए, मेरा सपना देखा,
जिसने हमारे लिए, राते जगे दिया परीक्षा।
जिनके ऑखों तारे, अरमानो सवारें,
तथा जिनके सामने तोतलाना, उंगलियॉ पकड चलना सीखा।
कैसे मैं उनके हृदय को, कुरेद दूॅ, झकझोर दूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
सभी संबंधी तथा वहॉ का वातावरण,
जिनके सहयोग ने, बनाया शैशव से किशेारण। 
जिनके ज्ञानों जागरूक हुआ, सम्भलना सीखा,
हर कदम पर, बढने के लिए, दिया जिन्होंने प्रेरण।
कैसे समय व्यर्थ कर, जीवन बुराइयों की ओर करू।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
 बाल्यावस्था की वो पढाई अध्यापक,
हर कष्ट हर कठिनाई में जिन्होने बनाया वाहक।
जिन्होंने हमारी नीव बनाई तथा,
हर पल सहयोग कर हमे बनाया व्यापक।
कैसे मैं उनके, मेहनत बेकार करूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
सत्कर्मों को, उन उद्देष्यों को, उनकी दीवारों को,
सत्कर्म की राह पर निर्देषित, हर वो त्योहारों को।
जीवन जहॉं कही से भी संवरी है,
हर वो संत, महात्मा, हर उन विचारों को।
सम्माहित ज्ञानों का, कैसे विरोध करूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
जीवनपर्यंत पहचान बने, उन पितृओ को,
हर परिचित अपरिचित, उन चित्रों को।
जिन्होंने हर समय, एक महान आत्म निर्माण किया,
मैं कैसे भूल जाउ, उन मित्रों को।
गलत मार्गों पर चल कैसे, आत्मा को तृप्त करूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
जिनके प्रेम से, वे मेरे प्राण बन गये,
जिनके आदर्श से, वे हर सत्कर्म के अहवान बन गये।
जिनके कर्मोंत्सर्ग ने, तथा व्यवहार से 
समय पर सहयोग, समय पर अधिकार से, भगवान बन गये।
कैसे उनसे, अपनी नजरों को मोड़ दॅूं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
कुछ लोग जो, मेरे दिल में रहते हैं,
जो निःस्वार्थ मेरे लिए करते है ।
जो मेरे कुछ नहीं पर,
मेरे लिए जीते है, मुझ पर मरते है।
क्यों ना जीवन, उनके खुशी के नाम करूॅं।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
मैं प्रकृति पुत्र, असफलताओं को मददेनजर,
अपने सपने और उनके उम्मीदों के दर पर।
मैं, मेरा तन मन, हर क्षण हर दम,
सोच विचार और मेहनत से, समय पर रहूॅ अग्रसर।
साक्षी भगवान, इरादे कसमें तमाम करूॅ।
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।
मैं तो कर्म पथ पर, मेहनत की होड़ हूॅ
कैसे मैं उनके, अनन्त उम्मीदों को तोड़ दूॅं।

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